हमारी अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा…! [PART-2]

जब आप अपने बैठक मे महंगे टीवी सोफे पर बैठ कर अपने मनपसंद कार्यक्रम का लुत्फ़ उठाते है कभी आपने सोचा की यह सुविधा आपके घर के चौखट तक किसने मुहएया करवाए, आपका लैपटॉप, आपकी महेंगी गाड़ी कौन लेकर आया ? क्या उनको इसका सठिक मेहेंताना मिला ? या उनके पास यह सुख सुविधा उपलब्ध है ? क्या हमने उनका तह दिल से शुक्रिया अदा किया ? अतः अपने सुखमय आलस भरी जिंदगी की बेड़िया तोड़ कर बाहर आये ओर इंसानियत का दामान थामे, हम सब एक ही हाड़ मांस रज्जा के पुतले ही तो है, तो फिर मै बड़ा तू छोटा कैसे ? बल्कि वह हमसे महान ही हुए ना ? हम जब कभी एक शहर से दुसरे सहर का सफ़र तय करते है तो टोल टैक्स देकर अपनी जिमेदारी से मुक्त होकर, गरमागरम खाना खाकर किसी बड़े होटल के गुदगुदे गद्दे पर निढाल होकर सो जाते है पर ट्रक ड्राइवर्स का क्या ? उनकी जिंदगी तो मात्र लोडिंग और अनलोडिंग के कशमकस के जंजाल मे अटक कर रह गए है, और इस जंजाल मे जीते रहने की आदत हो जाती है या बनानी पड़ती है और पता नही कब वह खुद अपने अंतिम स्वर्ग रूपी ट्रक पर खुद, खुद को लोड कर लेता है और हम सब मूकदर्शक बन कर तमाशा देख रहे होते है पर अंतिम गंतव्य स्थान उनका भी वही होगा जो हमारा होगा आगे या पीछे, जब हम इस जीवन रूपी हाईवे का सफ़र तय कर लेंगे तो फिर क्यों नही हम उनके साथ खड़े होकर हाथ मिला कर उनके जीवन को अलपसुगम करे, तभी हमारी अर्थव्यवस्था का आधार सुद्रढ़ होगा.



हमारी GST दिन दूनी रात चौगिनी तरक्की के पथ पर दौरेगी, कभी आपने बोरवेल के ट्रक्स को देखा होगा जो सैदव ही दक्षिण भारत के होते है, हम सिर्फ रुपये का विनमय करके निश्चिंत हो जाते है, क्या कभी वह ओणम या पोंगल अपने परिवार के साथ मनाते है.

हमारे ट्रक की दयानीय स्थिति मत पुछिय, मात्र एक लोहे का ढ़ाचा है, ना कोई सीट बेल्ट, ना एयर बैग्स, ना इंडिकेटर तरीके का, ना AC और भी ना जाने कितनी अनगिनत खामियां है, कुछ मे तो फर्स्ट ऐड बॉक्स भी नहीं है, सबसे महवपूर्ण ना कोई जीवन बीमा, वाहन बीमा, लीगल सपोर्ट, ट्रांस्पोर्तेर्स की मनमानी, पुलिस भी जबरन डंडे के ज़ोर पर मनमाना कर वसूलती है.



भारतीय सड़को पर जो बोले सो कम, ‘हाथी से लेकर चीटी’ तक सब चलते है, ‘BMW से लेकर बैलगाड़ी’ सभी की आम सड़क है बस फिर क्या है कोई मनचला डोलते हुई अगर ट्रक के सामने आजाये तो ड्राईवर को यमराज का दर्जा दिया जायेगा जो की हीरो बनेगा बाकी कुछ घंटों के सिनेमा का जिसमे भरपूर गालियाँ, मारपीट, लूट, आग़जनी सब शामिल होगा, क्या यह इंसानियत है या हमारी अशिक्शिता एवं आमानाविकता का नग्न स्वरुप है, तब उनके परिवार जनो का क्या ? क्या हम उनके परिवार जनों के लिए खड़े हो सकते है ? नए नही तो पुराने ही सही, एक मिठाई का डब्बा, बच्चों की पुरानी किताबे, कुछ पढने लिखने का सामान बाटने से अगर उनके सुनी जिंदगी मे रंग वापस ला सकते है, उनके बच्चो की खुशिया कुछ पल के लिए बटोर सकते है, कोशिश तो कीजिए क्योकि ‘कोशिश की कशिश’ ही हमको जीताती है और उसी मे हम सबकी जीत है अन्यथा हमारी अर्थव्यवस्था भी चरमरा सकती है, थोडा सा आसमान हम उन लोंगों के लिए भी खुशियों से भर दे तो हमारा क्या जायेगा, बल्कि इस तरह हम परोक्ष रूप से अपने देश के लिए और सुध्रध ढांचा तैयार करेगे जब हमारे ट्रक ड्राइवर्स खुशहाल, स्वस्थ जिंदगी यापन करेगें तब GST मे भी भरपूर इस्जाफा होगा, हमे इस रीढ़ को मजबूत करना है तभी हमारी यह जीवन रेखा हमारे ट्रक्स की रेस असीम, अनंत ‘हॉर्स पॉवर’ के साथ आगे बढे और अकल्पनिये क्षितिजो को छुए, पर उनके चालक दल भी दिन दूनी रात चौगिनी तरक्की करे तभी हमारे GST की भी संपूर्ण जीत होगी, अन्यथा अगर यह जीवन रेखा एक दिन के लिए भी अल्पविराम लगा दे तो निश्चित ही हमारे जीवन मे पूर्णविराम लगते कोई अवधि नही लगेगी, अतः पुनः सोंचे, विचार करे एवं आगे आए.

जय हिन्द जय भारत

GC’s Agenda For Truckers

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